700 years of heritage
Detailed history of Nagnechi Mata, Rao Duhad's Karnataka journey, and Nagana heritage
इतिहास के अनुसार, माता नागणेची का मूल स्वरूप देवी चक्रेश्वरी (Chakreshwari) है। राठौड़ राजवंश के संस्थापक राव सीहा के पौत्र राव धुहड़ (Rao Duhad) को जब यह आभास हुआ कि उनके साम्राज्य की आध्यात्मिक रक्षा के लिए एक कुलदेवी की अत्यंत आवश्यकता है, तब उन्होंने कठोर तप किया।
दैवीय प्रेरणा से राव धुहड़ दक्षिण भारत के कर्नाटक/कोंकण क्षेत्र पहुँचे, जहाँ उन्होंने चक्रेश्वरी माता की काष्ठ (नीम की लकड़ी) की १८ भुजाओं वाली दुर्लभ प्रतिमा प्राप्त की। इस प्रतिमा को लेकर जब वे मारवाड़ की ओर बढ़ रहे थे, तब एक अलौकिक घटना घटी।
मार्ग में बाड़मेर-जोधपुर की सीमा पर स्थित नागाणा गाँव में पहुँचने पर उनके रथ के पहिये थम गए और मूर्ति वहीं भूमि पर स्थापित हो गई। देवी माँ ने स्वप्न देकर नीम के वृक्ष के नीचे उसी स्थान पर अपनी प्रतिष्ठा करने का आदेश दिया। नागाणा गाँव में स्थापित होने के कारण माता का नाम नागणेची (Nagnechi) पड़ा।
नागाणा गाँव राठौड़ समाज के लिए मूल धाम (Mool Peeth) है। राठौड़ वंशावली के अनुसार, मध्यकाल से लेकर आज तक, किसी भी मांगलिक कार्य, विवाह या संतानोत्पत्ति के पश्चात् कुलदेवी के मूल मंदिर नागाणा में आकर धोक लगाना, जात-जडूले उतारना और आशीर्वाद प्राप्त करना एक अनिवार्य सामाजिक एवं धार्मिक परंपरा है।
समय-समय पर जोधपुर, बीकानेर, और किशनगढ़ के महाराजाओं ने नागाणा धाम की यात्रा की और मंदिर के संरक्षण व विस्तार के लिए भूमि दान (जागीर) और स्वर्ण छत्र अर्पित किए।
Rao Duhad, grandson of Rao Siha, journeyed to Karnataka to bring the wooden idol of Chakreshwari Devi, consecrating her under a Neem tree in Nagana. The deity became known as Nagnechi Mata.
Rao Jodha, the founder of Jodhpur city, installed an idol of Nagnechi Mata inside the Mehrangarh Fort, integrating the deity into Jodhpur's royal state ceremonies.
Rao Bika, founder of Bikaner, carried the ancestral traditions to Bikaner, establishing a dedicated shrine for Nagnechi Mata inside the Junagarh Fort area to protect his kingdom.
The Shree Nagnechiya Mata Mandir Trust, along with the support of the Rathore community and global devotees, renovated the temple complex, adding modern pilgrim amenities while preserving its ancient heritage.
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मंदिर के दैनिक पुजन, परिसर रखरखाव, भण्डारा व नवरात्रि व मेलों जैसे आयोजनों में सहयोग से आप भी माता की सेवा में भागीदार बन सकते हैं। दान शुद्ध मन से किया गया प्रसाद स्वरूप माना जाता है।